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सीमा सन्देश अखबार में छपी यह खबर वरिष्ठ स्वत्रन्त्र पत्रकार श्री अमरपाल सिंह जी ने लिखा इन्होने नागौर में राजस्थान पत्रिका के साथ काम करते उस दौरान संस्थान में विजिट कर बालिकाओं की शिक्षा को लेकर हुए प्रयास को बहुत नजदीकी से देखा है

उरमूल खेजड़ी संस्थान द्वारा जायल ब्लॉक में नायकों की ढाणियों बुरडी, नायकों की ढाणियों खारा मांजरा व एक.मुंडवा ब्लॉक के बागारियों की ढाणियों रोल में जीव दया फाउन्डेशन के सहयोग से संचालित ‘शाला पूर्व शिक्षण एवं पोषण केन्द्रों का संचालन किया जा रहा है इन केन्द्रों में वर्तमान में 100 बच्चे नामांकित है इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य है ऐसे बच्चे जिनके माता पिता गांव से दूर दराज ढाणियों में निवास करते है जो बच्चे आंगनवाड़ी और शाला पूर्व शिक्षा से वंचित है उन बच्चों में कुपोषण न हो एवं बच्चों का मानसिक एवं शारीरिक विकास हो इस कार्यक्रम के तहत केन्द्रों पर प्रतिदिन जन्म से 06 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों को दुग्ध और बिस्किट दिया जा रहा हैं।
इसी कार्यक्रम में इन ढाणियों में निवास करने वाले राहत फ़ूड किट वितरण किया जो 60 परिवारों को राहत सामग्री भी दी गई यह राहत सामग्री गरीब, घुमन्तु श्रेणी में है उन परिवारों को वितरण की गई । राहत सामग्री में 25 kg अनाज और मिर्ची, हल्दी, धनिया मसाला पाउडर दिया गया है। जो वर्ष में दो बार दिया जायेगा।
राहत सामग्री प्राप्त करते हुए बखता राम बावरिया ने बताया कि हम गरीब परिवार पिछले 25 वर्षों से मगरा रोल में निवास कर रहे हैं। 2011 में भारतीय जनगणना में 15 परिवारों का सर्वे में नाम शामिल हैं। सरकार द्वारा 2011 में पहली बार हमारा भी किसी गांव के निवासी यानी हम भारत के निवासी है की पहचान हुई। उसके बाद सबको राशन मिलने लगा है। सरकार ने सर्व में तो शामिल कर दिया लेकिन सब तरह की सुविधा से वंचित हैं। कई बार ग्राम पंचायत में मांग रखी गई लेकिन न रहने का मकान, न ही पीने के पानी की सुविधा है। हमने तो हमारा जीवन जंगल में रहकर बिता दिया लेकिन बच्चों का जीवन बहुत मुश्किल में है क्यों कि अब तो हमें कहीं पर भी बैठने नहीं देते। सरकारी जमीन पर भी बैठने से हटाने की धमकियां मिल रही हैं।
संस्थान कार्यकर्ता श्रवणलाल ने बताया कि घुमंतू परिवार जो गांव से दूर निवास करते है इन परिवारों के बच्चे एवं महिलाएं पोषण एवं स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित है इन स्थितियों को ध्यान में रखते हुए संस्थान प्रबंधन टीम ने जीव दया फाउंडेशन से सम्पर्क किया गया है जो इस प्रकार के परिवारों के बच्चों दुग्ध और बिस्किट मिले लेकिन वर्तमान में कहीं पर भी इन परिवारों के स्थाई निवास नहीं है बच्चों को बैठने के लिए छाया तक नहीं है। जायल, मुंडवा, नागौर ब्लॉक में ऐसे कई परिवारों की समस्या है कि बसने के लिए जमीन मिलना तो दूर की बात है आज तक राशन कार्ड तक जारी नहीं हुआ है।
धन्ना राम सचिव उरमूल खेजड़ी संस्थान ने बताया कि 2011 में कुछ गांवों में घुमंतु परिवारों के बारे में जानकारी प्राप्त करते हुए पाया कि घुमंतु परिवारों के साथ बहुत सारी समस्या है लेकिन नागौर के आस पास भी निवास करने वाले बावरिया परिवारों के पास ऐसा कोई सबुत नहीं है कि हम भारतीय हैं। किसी तरह का दस्तावेज नहीं है। 2011 के समय से लेकर आज भी देखा जाए तो बहुत सारे परिवारों के पास किसी तरह का दस्तावेज़ नहीं है। उनके बच्चों और महिलाओं की स्थिति बहुत ही खराब है। सरकार द्वारा प्राथमिकता तय करके इन परिवारों का सर्वे करके राहत दिलवाने की आवश्यकता है।
राहत पोषण किट के वितरण कार्य्रक्रम में टीकुराम , डेजर्ट फेल्लो राकेश यादव व रामनिवास शामिल रहे

उरमूल खेजड़ी संस्थान एवं उन्नति संस्थान जोधपुर के संयुक्त प्रयासों से स्कूली बच्चों के साथ पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम किया गया जिसमें विद्यार्थियों को जैव विविधता एवं परम्परागत जल स्रोतों के संरक्षण को लेकर विधार्थियों के साथ स्कूल इवेंट आयोजित किया गया जिसमे बचो को गाव के शामलात संसाधन जल स्रोत नाड़ी तालाब ओरण गोचर तथा देसी वनस्पति पर सेक्शन आयोजित करवाया और बच्चों को आस पास के वनस्पति विलुप्त हो रही जीव जन्तुओ की प्रजातिया सरहत भ्रमण आदि मुद्दों पर बच्चो को बताया गया

जिसमे मुख्यत निम्न गतिविधि आयोजित की गई सांप सीडी का खेल अन्तर पहचानो चार्ट जाळ वाला खेल के माध्यम से बच्चो में जागरूकता लाई गई और बच्चो को गाव के शामलात संसाधन जल स्रोत नाड़ी तालाब ओरण गोचर तथा देसी वनस्पति आदि का भ्रमण करवा कर समझ बनाने का प्रयास किया बच्चों ने संकल्प लिया कि हम हमारे दिन पर दो पेड़ लगाकर मनाऐगे। इस कार्यक्रम में मुण्डवा ब्लॉक 3 विद्यालयों के कुल 294 विद्यार्थियों एवं 19 अध्यापकों ने भाग लिया।

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बेहद विषम और विपरीत परिस्थितियों वाला इलाका है जिला नागौर। यहां के गांवों में आज भी कई ऐसी चुनौतियां और समस्याएं हैं, जिनका सामना शहरी क्षेत्र के लोगों को सामान्यत: नहीं करना पड़ता। नागौर जिले में अगर जायल व नागौर ब्लॉक इलाके को देखा जाए तो जिंदगी सहज नहीं लगती। यह ऐसा इलाका है, जो लगातार अकाल का सामना करता है। सामाजिक-आर्थिक विषमताएं अभी भी बरकरार हैं। उरमूल की गतिविधियों के तहत हमने सुख-सुविधाओं से वंचित और अत्यंत गरीबी झेल रहे इस इलाके को कामकाज के लिए चुना और यहां बदलाव लाने की ठानी। हमने 1993 में उरमूल खेजड़ी संस्थान का मुख्यालय इसी ठेठ देहाती क्षेत्र के गांव झाड़ेली में स्थापित किया ताकि लोगों के बीच रह कर वास्तविकता से रूबरू हो सकें। उरमूल की समृद्ध परंपराओं का निर्वाह करते हुए हमने यहां दलितों, गरीबों, असहायों, मजदूरों, पीडि़तों, विधवाओं, विकलांगों और शिक्षा से वंचित बच्चों को लक्ष्यबद्ध कर उनके जीवन स्तर में सुधार लाने के प्रयास शुरू किए, जो निरंतर जारी हैं। क्षेत्र के करीब पचास गांवों में उरमूल की ओर से विभिन्न गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। हमारे प्रयासों से यहां सब कुछ बदल गया हो, ऐसा दावा तो नहीं किया जा सकता मगर हां, बहुत कुछ जरूर बदला है। अकाल के कारण पलायन करने वाले श्रमिकों की समस्याओं के समाधान के लिए हमने जो प्रयास किए, उनका प्रतिफल सबके सामने है। शिक्षा से वंचित बच्चों, खासकर बच्चियों को आवासीय शिविरों में पढ़ाने जैसा महत्वपूर्ण कार्य हम निरंतर जारी रखे हुए हैं। भले ही इस इलाके में आज भी नाबालिग बच्चियों के हाथ पीले कर दिए जाते हों मगर खुशी है उनके परिजन गौना होने तक उनकी पढ़ाई के लिए आगे आ रहे हैं। ऐसी बच्चियों ने हमारे शिविरों में अनौपचारिक शिक्षा के बाद आठवीं-दसवीं कक्षा उत्तीर्ण की है। दृष्टि कार्यक्रम के जरिए नेत्र संबंधी रोगों के इलाज व दृष्टि बाधित लोगों को रोजगार से जोडऩे की दिशा में काम हो रहा है। गांवों में अस्पृश्यता को दूर करने के लिए सामुदायिक जलस्रोतों के जीर्णोद्धार व व्यक्तिगत जलस्रोतों की उपलब्धता जैसा अनूठा काम उरमूल खेजड़ी के प्रयासों का ही उदाहरण है। उरमूल की गतिविधियों की बदौलत यह बदलाव इस इलाके में भविष्य की सुखद तस्वीर पेश करता है। इसका श्रेय यकीनन संस्था के स्वयंसेवकों की मेहनत व समर्पण को है लेकिन इसमें इलाके के जन प्रतिनिधियों, समाजसेवियों तथा बुद्धिजीवियों का भी अविस्मरणीय सहयोग है, जिन्होंने हर मुश्किल व जरूरत के समय हमारा साथ दिया। हम ग्रामीण राजस्थान के विकास में इसी प्रकार जुटे रहने का संकल्प करते हैं। सादर आभार।

धन्नाराम
सचिव,
उरमूल खेजड़ी संस्थान

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